12th Biology Reproduction Health Subjective Question 2024
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12th Biology Reproduction Health Subjective Question 2024: जनन स्वास्थ्य MVVI Subjective Question Exam 2024

12th Biology Reproduction Health Subjective Question 2024: जनन स्वास्थ्य MVVI Subjective Question Exam 2024, BiharBoard.org.in

प्रश्न 1. बध्यता क्या है? इस स्थिति में कौन-कौन से तरीके उपलब्ध हैं

उत्तर- दो वर्ष तक मुक्त या असुरक्षित सहवास के बावजूद गर्भाधान न हो पाने की स्थिति को बंध्यता कहते हैं। ऐसे निःसंतान दंपतियों की मदद हेतु अब
विभिन्न उपाय उपलब्ध हैं-

(क) पाते निषेचन शरीर से बाहर लगभग शरीर के भीतर जैसी स्थितियों में निषेचन।

(ख) भ्रूण स्थानांतरण प्रयोगशाला में अनुरूपी परिस्थितियों में युग्मनज बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है, इस युग्मनज या प्रारंभिक भ्रूण (8 ब्लास्टोमीयर) को फैलोपीयन नलिकाओं में स्थानांतरित किया जाता है और जो भ्रूण 8 ब्लोस्टोमीयर से अधिक होता है उसे परिवर्धन हेतु गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है।

 

प्रश्न 2. जनन स्वस्थ्य प्राप्ति के लिए विभिन्न कार्य योजनाओं के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन के लिए क्या-क्या सुविधाएँ आवश्यक है?

उत्तर- जनन स्वास्थ्य प्राप्ति के लिए विभिन्न कार्य योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए संरचनात्मक सुविधाओं, व्यावसायिक विशेषज्ञता तथा भरपूर भौतिक सहारों की आवश्यकता होती है। लोगों को जनन संबंधी समस्याओं जैसे की सगर्भता, प्रसव, यौन संचारित रोगों, गर्भपात, गर्भ निरोधकों, माहवारी संबंधी समस्याओं, बंध्यता (बाँझपन) आदि के बारे में चिकित्सा सहायता एवं देखभाग उपलब्ध कराना आवश्यक है। समय-समय पर बेहतर तकनीकों और नई कार्यनीतियों को क्रियान्वित करने की भी आवश्यकता है, ताकि लोगों को अधिक सुचारू रूप से देखभाल और सहायता की जा सके। बढ़ती मादा भ्रूण हत्या की कानूनी रोक के लिए उल्बवेधन ( ऐमीनोसेंटेसिस) जाँच, लिंग परीक्षण पर वैधानिक प्रतिबंध तथा व्यापक प्रतिरक्षीकरण (टीका) आदि कुछ महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों को भी शामिल किया गया है।

 

प्रश्न 3. असंक्राम्यता में लिंफोसाइट के कार्य का वर्णन करें

उत्तर- असंक्राम्यता में लिंफोसाइट निम्नलिखित कोशिकाओं का निर्माण करता है जिसका विशेष कार्य होता है-

(क) कीलर कोशिकाएँ आक्रमण के स्थान पर ये कोशिकाएँ एक प्रकार का रसायन तैयार करते हैं, जिसमें फैगोसाइट्स आकर्षिक होता है, जो एंटीजन को नष्ट करता है एवं अन्य टी-कोशिकाओं को आकर्षित करता है।
(ख) सहायक टी-कोशिकाएं ये एंटीबॉडीज तैयार करने के लिए बी-कोशिकाओं को उद्दीप्त करते हैं।

(ग) निरोधी-टी कोशिकाएँ: ये असंक्राम्य तंत्र को पूर्ण रूप से दमन करने के लिए है।

(घ) टी-लिंफोसाइट्स कुछ टी लिंफोसाइट्स मेमोरी कोशिकाओं का निर्माण करते हैं, जो शरीर प्रतिरक्षा के लिए आवश्यक है।

 

प्रश्न 4. एकल- कोशिका प्रोटीन की व्याख्या कीजिए। इसके फायदे की विवेचना कीजिए।

उत्तर- मनुष्य और जानवरों के पोषण के लिए सूक्ष्मजीवों द्वारा खाने योग्य प्रोटीन का वृहत मात्रा में उत्पादन करना, एकल कोशिका प्रोटीन कहलाता है। ये सूक्ष्मजीवों जैसे- जीवाणु, यीस्ट, मोल्ड्स, उच्च कवक और कुछ शैवाल की शुष्क कोशिका होती है। एकल कोशिका प्रोटीन के उत्पादन के लिए कच्ची सामग्री- भूसा, शीरा, पशु, खाद, गंदा जल इत्यादि का उपयोग होता है।

एकल कोशिका प्रोटीन से निम्नलिखित फायदे हैं-

(i) एकल कोशिका प्रोटीन (SCP) मनुष्यों को प्रोटीनयुक्त आहार देता है।

(ii) SCP उत्पादन औद्योगिक प्रवाह पर आधारित है जो पर्यावरण प्रदूषण कम करने में सहायता देता है
(iii) इसका उत्पादन जलवायु से प्रभावित नहीं होता है।

(iv) इसके उत्पादन के लिए कम जगह की आवश्यकता होती है।

 

प्रश्न 5. जीन चिकित्सा क्या है? एडीनोसीन डिएमीनेज (ADA) की कमी का उदाहरण देते हुए व्याख्या करें।

उत्तर-जीन चिकित्सा में उन विधियों का सहयोग लेते हैं जिनके द्वारा किसी बच्चे या भ्रूण में चिन्हित किए गए जीन दोषों का सुधार किया जाता है। उसमें रोग के उपचार हेतु जीनों को व्यक्ति की कोशिकाओं या ऊतकों में प्रवेश कराया जाता है। आनुवांशिक दोष वाली कोशिकाओं के उपचार हेतु सामान्य जीन को व्यक्ति या भ्रूण में स्थानांतरित करते हैं जो निष्क्रिय जीन की क्षतिपूर्ति कर उसके कार्यों को सम्पन्न करता है।

जीन चिकित्सा का पहले पहल प्रयोग वर्ष 1990 में एक चार वर्षीय लड़की में एडीनोसीन डिएमीनेज (एडीए) की कमी को दूर करने के लिए किया गया। था। यह एंजाइम प्रतिरक्षा तंत्र के कार्य के लिए अति आवश्यक होता है। उपर्युक्त समस्या जो एंजाइम एडीनोसीन डिएमीनेज के लिए जिम्मेदार है जो इसके लोप होने के कारण होता है।

कुछ बच्चों में एडीए की कमी का उपचार अस्थिमज्जा के प्रत्यारोपण से होता है। जबकि दूसरों में एंजाइम प्रतिस्थापन चिकित्सा द्वारा उपचार किया जाता है, जिसमें सूई द्वारा रोगी को सक्रिय एडीए दिया जाता है। उपरोक्त दोनों विधियों में यह कमी है कि ये पूर्णतया रोगनाशक नहीं है। जीव चिकित्सा में सर्वप्रथम रोगी के रक्त से लसीकाणु को निकालकर शरीर से बाहर संवर्धन किया जाता है सक्रिय एडीए की सी डीएनए (पश्च विषाणु संवाहक का प्रयोग कर) लसीकाणु में प्रवेश कराकर अंत में रोगी के शरीर में वापस कर दिया जाता है। ये कोशिकाएँ मृत प्राय होती है, इसलिए आनुवंशिक निर्मित लसीकाणुओं को समय-समय पर रोगी के शरीर से अलग करने की आवश्यकता होती है। यदि मज्जा कोशिकाओं से विलगित अच्छे जीनों को प्रारंभिक भ्रूणीय अवस्था की कोशिकाओं से उत्पादित एडीए में प्रवेश करा दिया जाए तो यह एक स्थायी उपचार हो सकता है।

 

प्रश्न 6. गर्भ निरोधक की प्राकृतिक विधियों का वर्णन करें।

उत्तर- गर्भ निरोधक की प्राकृतिक विधियाँ अंडाणु एवं शुक्राणु के संगम को रोकने के सिद्धांत पर कार्य करती हैं। यह निम्न विधियों द्वारा हो सकता है-

(i) इनमें से एक उपाय आवधिक संयम है। जिसमें एक दम्पति महावारी चक्र/ऋतुस्राव चक्र के 10वें से 17वें दिन के बीच की अवधि के दौरान मैथुन से बचते हैं जिसे अंडोत्सर्जन की अपेक्षित अवधि मानते है। इस अवधि के दौरान निषेचन एवं उर्वर (गर्भाधरण) के अवसर बहुत अधि क होने के कारण इसे निषेच्य अवधि भी कहा जाता है। इस तरह से, इस दौरान मैथुन (सहवास) न करने पर गर्भाधान से बचा जा सकता है।

(ii) बाह्य स्खलन या अंतरित मैथुन (कोइटस इन्ट्रप्सन) एक अन्य विधि है जिसमें पुरूष साथी संभोग के दौरान वीर्य स्खलन से ठीक पहले स्त्री की योनि से अपना लिंग बाहर निकालकर वीर्य स्खलन योनि के बाहर करता है।

(iii) स्तनपान अनार्तव (लेक्टेशनल एमेनोरिया) विधि में प्रसव के बाद स्त्री द्वारा शिशु को भरपूर स्तनपान कराने के दौरान अंडोत्सर्ग और आर्तव चक्र शुरू नहीं होता है। इसलिए जितने दिनों तक माता शिशु को पूर्णतः स्तनपान कराना जारी रखती है, गर्भाधान के अवसर लगभग शून्य होते हैं। यह विधि प्रसव के बाद ज्यादा से ज्यादा 6 माह की अवधि तक ही कारगर मानी गई है। चूंकि उपर्युक्त विधियों में किसी भी प्रकार का दवा का इस्तेमाल नहीं किया गया है अतः इसके दुष्प्रभाव लगभग शून्य के बराबर है। लेकिन इसके असफल रहने की दर काफी अधिक है।

 

प्रश्न 7. जनसंख्या नियंत्रण हेतु गर्भ निरोधन की विभिन्न विधियों की विवेचना करें।

उत्तर- जनसंख्या नियंत्रण के लिए आजकल गर्भनिरोधक की कई विधियाँ मानव द्वारा प्रयुक्त होने लगी हैं। ऐसा लोगों में जागरूकता के कारण संभव हो पाया है।

कुछ प्रमुख गर्भनिरोधक की विधियाँ निम्नलिखित हैं-
(a) मुखीय गर्भनिरोधक (Oral Contraception)-इस विधि का प्रयोग मुख्यतः महिलाओं द्वारा किया जाता है। इसमें हार्मोन युक्त टिकिया को मुख द्वारा ग्रहण किया जाता है जो अण्डक्षेपण चक्र को बदलकर अंडोत्पादन को अवरुद्ध कर देता है। ये टिकिया गर्भाशय भित्ति स्तर के गुण को बदल देता है। फलतः गर्भाशय को युग्मनज के प्रतिस्थापन (Implantation) के प्रतिकूल भी बना देता है।

(b) IUCD, जैसे- कॉपर-टी या लूप तकनीक का उपयोग महिलाओं के जनन नाल में कर अंडरोपन को अवरुद्ध किया जा सकता है।

(c) कण्डो / डायफ्रॉम इत्यादि के प्रयोग द्वारा निषेचन को रोध हो।

(d) शल्य क्रिया (जैसे महिला में Tubectomy तथा पुरुष में Vasec tomy) द्वारा शुक्राणु का अंडे से संयोग को रोका जा सकता है। इसे महिला या पुरुष नसबंदी भी कहा जाता है।

 

प्रश्न 8. बन्ध्य दम्पत्तियों को संतान पाने हेतु सहायता देने वाली कुछ विधियों बताएँ।

उत्तर- विशिष्ट स्वास्थ्य सेवा इकाइयाँ (वंध्यता क्लीनिक आदि) नैदानिक ТВО जाँच में सहायक हो सकती हैं और इनमें से कुछ विकारों का उपचार करके दम्पत्तियों को बच्चे पैदा करने में मदद दे सकती हैं। ये तकनीक सहायक जन प्रौद्योगिकियों (A.R.T.) कहलाती है।

पात्रे निषेचन (L.V.F.) इनफर्टिलाइजेशन अर्थात् शरीर से बाहर लगभग शरीर के भीतर जैसी स्थितियों में निषेचन) के द्वारा भ्रूण स्थानांतरण (E.T.) ऐसा एक उपाय हो सकता है। इस विधि में, जिसे लोकप्रिय रूप से टेस्ट ट्यूब बेबी कार्यक्रम के नाम से जाना जाता है, प्रयोगशाला में पत्नी का या हाता स्त्री के अण्डे से पति अथवा दाता पुरुष से प्राप्त किए गए शुक्राणुओं को एकत्रित करके प्रयोगशाला में अनुरूप परिस्थितियों में युग्मनज बनने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस युग्मनज या प्रारंभिक भ्रूण (8 ब्लास्टमियर तक) को फैलोपी नलिकाओं में स्थानांतरित किया जाता है जिसे मनाही (फैल स्थानांतरण अर्थात् जॉइगोट इंट्रा फैलोपियन ट्रांसफर (ZLF.T.) कहते हैं और जो भ्रूण 8 ब्लास्टोमियर से अधिक का होता है तो उसे परिवर्धन हेतु गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है। इसे इंट्रा यूटेराइन ट्रांसफर (L.U.T.) कहते हैं। जिन स्त्रियों में गर्भधारण की समस्या रहती है, उनकी सहायता के लिए जीवे निषेचन (इन विवो फर्टीलाइजेशन स्त्री के भीतर ही युग्मकों का संलयन) से बनने वाले भ्रूणों को भी स्थानांतरण के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है।

ऐसे मामलों में जहाँ स्त्रियाँ अण्डाणु वातावरण प्रदान कर सकती, लेकिन जो निषेचन और भ्रूण के परिवर्धन के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान कर सकती है, उनके लिए एक अन्य तरीका अपनाया जा सकता है। इसमें दाता से अण्डाणु लेकर उन स्त्रियों की फैलोपी नलिका में स्थानांतरित (G.I.F.T.) कर दिया जाता है। प्रयोगशाला में भ्रूण बनाने के लिए अंतःकोशिकीय शुक्राणु निक्षेषण (I.C.F.L.) दूसरी विशिष्ट प्रक्रिया है जिसमें शुक्राणु को सीधे ही अण्डाणु में अंतःक्षेपित किया जाता है। बंध्यता के ऐसे मामलों में जिनमें पुरुष साथी स्त्री को वीर्य संचित कर सकने के योग्य नहीं है अथवा जिसके स्खलित बीर्य में शुक्राचुओं की संख्या बहुत की कम है, ऐसे दोष का निवारण कृत्रिम वीर्य सेचन (A.I.) तकनीक से किया जा सकता है। इस तकनीक में पति या स्वस्थ दाता से शुक्र लेकर कृत्रिम रूप से या तो स्त्री की योनि में अथवा उसके गर्भाशय में प्रविष्ट किया जाता है। इसे अंतगर्भाशय वीर्य सेचन (IU.L) कहते हैं

 

प्रश्न 9. क्या गर्भ निरोधकों का उपयोग न्यायोचित है? कारण बताएँ।

उत्तर-विकासशील देशों में अनियंत्रित तरीके से बढ़ रही जनसंख्या के कारण अन्न, आवास तथा कपड़े जैसी मूलभूत आवश्यकताओं का नितांत अभाव हो सकता है। इसलिए सरकार पर यह दबाव था कि इस प्रकार की जनसंख्या वृद्धि दर को काबू रखने के लिए गंभीर उपाय अपनाए जाएँ। इस प्रकार की समस्या से निपटने के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपाय यह था कि लघु परिवार को बढ़ावा देने हेतु गर्भ निरोधक उपाय अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए। सरकार ने एक खुशहाल जोड़े के साथ दो बच्चों का परिवार ‘हम दो हमारे दो’ के नारे के साथ प्रदर्शित किया। बहुत सारे जोड़ों ने, विशेषकर शहरों के काम-काजी युवा दंपतियों ने ‘हम दो हमारा एक’ का नारा अपनाया है। विवाह की वैधानिक आयु स्त्री केलिए 18 वर्ष तथा पुरुष के लिए 21 वर्ष सुनिश्चित हैं और इस समस्या से निपटने के लिए लघु परिवार के लिए जोड़ों को प्रोत्साहित किया जाता है।

आजकल व्यापक परिधि के गर्भ निरोधक साधन आसानी से उपलब्ध हैं; उन्हें मोटे तौर पर निम्न श्रेणियों में बाँटा जा सकता है, जैसे-प्राकृतिक/परंपरागत, रोध (बैरियर), आई यूडीज (कॉपर-टी), मुँह से लेने योग्य गर्भ निरोधक, टीका रूप में, अंतर्राप तथा शल्य-क्रियात्मक विधियाँ। इनमें से कोई भी एक विधि अपनी आवश्यकता और उपयोगिता के अनुसार हम चुन सकते हैं।

 

प्रश्न 10. आनुवांशिकता का गुणसूत्रीय सिद्धांत को स्पष्ट करें।

उत्तर- आनुवांशिकता का गुणसूत्रीय सिद्धांत (Chromosome Theory of Heridity)-

(i) गुणसूत्र एवं जीन दोनों ही द्विगुणित कोशिकाओं में जोड़े में पाने जाते हैं।

(ii) अर्द्धसूत्री विभाजन । के युग्मीकरण के दौरान गुणसूत्र एवं जीन का पृथक्कीकरण होता है। अतः प्रत्येक युग्मक प्रत्येक जोड़ा का केवल एक ही गुणसूत्र प्राप्त करता है।

(iii) गुणसूत्र एवं जीन निषेचन के बाद फिर से जोड़े में आ जाते हैं।

(iv) जीव के जीवनचक्र में गुणसूत्र और जीन वैयक्तिता एवं संरचना बनाये रखते हैं।

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